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बच्चों को मैला देख खाने की कतार में पीछे खड़ा कर देते हैं, एक कमरे में 60 लोगों के साथ रहने की चुनौती; चाइल्ड मैरिज बढ़ने की भी आशंका

धार्वी वेद. दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में 17 साल का नानकेश बिना मास्क लगाए कचरा बीनने में व्यस्त है। कोरोनावायरस के बाद उसकी रोजी-रोटी पर खासा असर पड़ा है। उसका कहना है, "कचरा बीनना कभी इतना मुश्किल नहीं रहा। लॉकडाउन के दौरान मेरे पास बिल्कुल पैसे नहीं थे। जीना इतना मुश्किल पहले कभी नहीं था।"

नानकेशन उन लाखों बच्चों में से हैं, जो भारत में सड़कों पर रहते हैं। इनमें से कई के पास कोई कानूनी कागज नहीं हैं, जो उनके वजूद का सबूत हो। इतना ही नहीं, डॉक्यूमेंट्स न होने के कारण इन्हें बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलती हैं।

सबसे ज्यादा संकट में थे बच्चे
चाइल्डहुड एन्हेंसमेंट थ्रू ट्रेनिंग एंड एक्शन (CHETNA) के डायरेक्टर संजय गुप्ता कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान सड़क पर रहने वाले बच्चे सबसे ज्यादा संकट में थे। अगर आप उनके कमाने केतरीकेदेखेंगे तो वे भीख मांगने, सामान बेचने या किसी परिवार के लिए काम करने परनिर्भर थे। कोविड के कारण सब पर असर पड़ा है।

आंखों में गंदगी, कान में मैल, खराब दिखने की वजह से खाना भी नहीं मिला
गुप्ता बताते हैं कि आवाजाही बंद होने के कारण बच्चों से जुड़े रहना चुनौती था। बातचीत नहीं होने के कारण इन बच्चों के ठिकानों का भी पता नहीं चल सका। उन्होंने कहा कि सबकुछ सही नहीं था। बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियां हो गईं थीं।

कई बच्चे गंदगीभरेहालात में मिले। उनकी आंखों में कीचड़ और कान में मैल जमा हुआ था। उन्होंने अपनी डाइट का आधा खाना भी नहीं खाया था।कुछ बच्चों ने दावा किया कि खाना बांटने के वक्त बुरे हाल होने के कारण उनसे भेदभाव किया गया।

गुप्ता बताते हैं कि सरकार राहत को लेकर काफी तेज थी, लेकिन जातिऔर वर्ग जैसे भेदभावझुग्गियों में आज भी हावी हैं। अगर खाना बांटने के लिए लाइन लगती थी तो इन बच्चों को आखिर में खड़ा होने के लिए कह दिया जाता था। उनके कपड़े, उलझे हुए बाल और बदबू के कारण लोगों को डर था कि वे बच्चों से वायरस का शिकार हो जाएंगे।

एक चुनौती सोशल डिस्टेंसिंग
यहां वायरस को लेकर जागरूकता और फिजिकल डिस्टेंसिंग को सुनिश्चित करना भी एक चुनौती थी। दिल्ली स्थित एक नाइट शेल्टर में रहने वाली 16 साल की संगीता बताती हैं कि इस कमरे में कम से कम 60 लोग रहते हैं। जब दुनिया सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में बात कर रही हैं, तब हमारे पास कोईविकल्प नहीं है। हम एक-दूसरे के करीब सोते हैं।

यूनिसेफ की रिपोर्ट- भारत में पांच साल और इससे कम उम्रके बच्चों की होंगी मौतें
यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साउथ एशिया में कोविड 19 के कारण 60 करोड़ बच्चों का भविष्य खतरे में है। जहां 24 करोड़ बच्चे पहले ही कई तरह की गरीबी में रह रहे हैं। वहां इस संकट के कारण और 12 करोड़ बच्चे गरीबी में धकेले जाएंगे। रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत में पांच साल या इससे कम उम्र के बच्चों की मौत का हिस्सा बड़ा होगा।

यूनिसेफ इंडिया के चीफ ऑफ चाइल्ड प्रोटेक्शन के सोलेदाद हेरेरो कहते हैं कि संकट से पहले यह अनुमान था कि भारत में करीब 15.5 करोड़ बच्चे मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी लाइन के नीचे थे, जो रूस की पूरी आबादी के लगभग बराबर है। एक पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी के तौर पर शुरू हुआ कोरोना अब बहुआयामी संकट में बदल गया है, जिससे कुपोषण, गरीबी, हिंसा और खराब मानसिक बीमारियों की महामारी आई है।

13 सालों की प्रगति पर खतरा
एनजीओ चाइल्ड राइट्स एंड यू (CRY) कहते हैं कि 2005-06 से 2017-18 के बीच भारत के मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स में 0.283 से 0.123 का सुधार हुआ था। अब महामारी के कारण इस प्रोग्रेस पर खतरा बना हुआ है, क्योंकि सभी सोशियोइकोनॉमिक इंडिकेटर्स पर बुरा प्रभाव पड़ा है।

CRY की प्रमुख पूजा मारवाह बताती हैं कि लॉकडाउन से बच्चों को मिलने वाली कई बुनियादी सुविधाएं जैसे ग्रोथ मॉनिटरिंग, न्यूट्रिशन, इम्युनाइजेशन, सेक्सुअल और रिप्रोडक्टिव हेल्थ सुविधाएं, एजुकेशन और प्रोटेक्शन बाधित हुई हैं। इससे मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी में रहने वाले बच्चे प्रभावित हुए हैं,क्योंकि वे अपने अधिकारों को लेकर काफी हद तक निर्भर हैं।

सड़कों पर हुई कई बच्चों की मौतें
महामारी के बाद भारत ने सबसे बुरा प्रवासी संकट देखा है। कई प्रवासी मजदूर पैदल ही घर के लिए निकल गए थे। इस दौरान बड़े और असुरक्षित सफर के कारण कई बच्चों की मौत की खबर आई थी।

हेरेरो ने कहा "यह जानना जरूरी है कि भारत में प्रवासी मजदूरों में बच्चों का हिस्सा ज्यादा है। अगर आप सेंसस की जानकारी देखेंगे,भले ही पुरानी तोआप पाएंगे कि 5 में से 1 बच्चा प्रवासी है। ऐसे में रातों-रात जगह छोड़ने के कारण बच्चे ट्रॉमा और तनाव का शिकार हुए थे।"

"इन प्रवासी यात्राओं में कई बच्चे बिना साथी के या अकेले थे। हमारे पास सबूत थे कि जब बिहार ने माइग्रेशन के आंकड़ों को रजिस्टर करना शुरू किया तो शुरुआत में पाया गया कि इनमें से 5 प्रतिशत प्रवासी अकेले चलने वाले बच्चे हो सकते हैं"।

मारवाह के अनुसार, शुरुआती सालों में बच्चों में यह तनाव पूरे जीवन में फैसला लेने और आत्मसम्मान को प्रभावित कर सकता है।

चाइल्ड लेबर और मैरिज के लिए खतरा
कोविड 19 से चाइल्ड लेवर और मैरिज के खिलाफ लंबी लड़ाई भीप्रभावित हो सकती है। जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, चाइल्डलाइन इंडिया हेल्पलाइन पर बाल विवाह से जुड़े 5500 से ज्यादा कॉल आ चुके हैं। हेरेरो कहते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में गरीबी, नौकरी जाना और आर्थिक तनाव के साथ यह साफ है कि परिवार नकारात्मक रास्ते की तरफ जाएंगे। संकट में घिरे परिवारचाइल्ड लेबर और मैरिज जैसे दो रास्तों का सहारा सबसे ज्यादा लेंगे।"

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अब कई सेक्टरखर्च में कटौती और ज्यादा लेबर के लिए उतारू हैं। यह हालात चाइल्ड लेबर बढ़ाने सहायक होंगे। घर के बड़ों में कमाई का बंद होना और केयरगिवर्स की मौत के बाद ज्यादा बच्चे काम के लिए मजबूर होंगे। मारवाह कहती हैं कि स्कूल बंद होने के साथ घर में बढ़ी गरीबी लड़कियों में बाल विवाह को बढ़ा सकती है,क्योंकि इनमें से ज्यादातर को दायित्व समझा जाता है।"

अमीरों के लिए है कोरोनावायरस
नानकेश कम उम्र में ही अनाथ हो गया था और तब से सड़कों पर रह रहा है। वो जानता है कि जीने का मतलब क्या होता है। नानकेश का कहना है कि कोरोनावायरस अमीरों के लिए है, हमारे लिए नहीं। गरीबों को काम करना होगा। मेरा कोई परिवार नहीं है, इसलिए मुझे चिंता करने के लिए कुछ नहीं है। मैं केवल रोज की मजदूरी चाहता हूं।"



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खाना बांटने वाले लोग बच्चों के मैले शरीर और खराब हालत को देखकर लाइन में आखिर में खड़ा कर देते हैं। उन्हें बच्चों के जरिए कोरोनावायरस संक्रमण होने का डर है।


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